राजनीतिक उपेक्षा और शोषण
हरियाणा में सफाई कर्मचारी पिछले तीन दशकों से राजनीतिक उपेक्षा और शोषण का सामना कर रहे हैं। सर्व कर्मचारी संघ हरियाणा और नगरपालिका कर्मचारी संघ हरियाणा के राज्य प्रधान नरेश कुमार शास्त्री के अनुसार, सरकार ने 13 वर्षों के कार्यकाल में सफाई एवं सीवर कर्मचारियों को पक्की नौकरी से बेदखल कर ठेकेदारों का बंधुआ मजदूर बना दिया है। शास्त्री ने आरोप लगाया कि नियमित भर्ती न करना सरकार का दलित विरोधी कदम है, जिसके कारण हजारों सफाई कर्मचारी गरीबी और बेबसी की जिंदगी जीने को मजबूर हैं।
आंदोलन और माँगें
प्रदेश भर के सफाई कर्मचारी अब अपने अधिकारों के लिए संगठित होकर संघर्ष कर रहे हैं। 9 नवंबर को कुरुक्षेत्र में एक विशाल रैली के बाद, दक्षिणी हरियाणा के फरीदाबाद, गुरुग्राम, नूहू, पलवल, भिवानी, महेंद्रगढ़, नारनौल और दादरी में सैकड़ों सफाई कर्मचारियों ने उपायुक्तों के माध्यम से मुख्यमंत्री को ज्ञापन सौंपे हैं। उनकी प्रमुख माँगें निम्नलिखित हैं:
- ठेकेदारी प्रथा से मुक्ति।
- नए पदों का सृजन और रिक्त पदों पर नियमानुसार नियमित भर्ती।
- सभी विभागों के कच्चे, पार्ट टाइम, दैनिक वेतन भोगी और हरियाणा कौशल रोजगार निगम के तहत कार्यरत सफाई कर्मचारियों को पक्का करना।
- न्यूनतम वेतन 30,000 रुपए निर्धारित करना।
आगामी रणनीति
प्रदर्शनों का यह क्रम 27 और 28 फरवरी को भी जारी रहेगा। इसके बाद, सफाई संघर्ष समिति विभिन्न संगठनों के साथ मिलकर आगामी आंदोलन की रणनीति तैयार करेगी। कर्मचारियों ने सरकार से शीतकालीन विधानसभा सत्र में इन मांगों का समाधान करने की अपील की है, अन्यथा वे “गुलामी से मुक्ति, मौलिक अधिकारों की प्राप्ति और आर्थिक-सामाजिक बराबरी” की लड़ाई जारी रखेंगे। वर्तमान में हरियाणा में 67 हजार सफाई कर्मचारी कार्यरत हैं, जबकि आबादी के अनुपात में 1.2 लाख सफाई कर्मचारियों और 25 हजार सीवरमैन की आवश्यकता है।



